पूंजीवाद क्या है? कैसे यह ग्राहकों को प्रभावित करता है?

0
25335
capitalism

पूंजीवाद क्या है? कैसे यह ग्राहकों को प्रभावित करता है?

पूंजीवाद का उदय यूरोप से हुआ और यह 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के समय मुख्य रूप से सामने आया। स्कॉटिश विचारक एडम स्मिथ पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को विकसित करने वाले पहले व्यक्ति थे। स्मिथ ने मुक्त बाजार व्यवस्था के लिए लड़ाई लड़ी। उनका मानना था कि लोगों को अपनी संपत्ति का निर्माण स्वतंत्र रूप से करना चाहिए। उनके विचार प्रासंगिक रहे और समय के साथ पूंजीवाद एक स्वतंत्र आर्थिक ढांचा बन गया, जिसने यू.एस., स्विट्ज़रलैंड, यूएई, सिंगापुर, आदि देशों की वित्तीय स्थिति को बदल दिया। इन देशों के आर्थिक विकास में पूंजीवाद का बहुत योगदान रहा है, लेकिन पूंजीवाद के लाभ के साथ-साथ कुछ नुकसान भी हैं। इसलिए इस लेख के माध्यम से हम पूंजीवाद क्या है?, इसके लाभ, प्रभाव और दुष्प्रभाव की जानकारी देने जा रहे हैं।

पूंजीवाद क्या है?

पूंजीवाद एक आर्थिक व्यवस्था है। इस व्यवस्था में सरकार की बाजार को नियंत्रित करने में कोई खास सक्रिय भूमिका नहीं होती है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन या निर्माण के साधन मुख्य रूप से निजी स्वामित्व में होते हैं। जिन व्यक्तियों के पास निर्माण के साधन जैसे कारखाने, मिल, उद्योग आदि होते हैं, वो इनसे उत्पादित माल को बेचकर लाभ प्राप्त करते हैं। पूंजीवाद व्यक्तियों को अपने लाभ और आय का प्रबंधन करने का अवसर प्रदान करता है।

आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विश्व के अधिकतर देश लोकतंत्र और पूंजीवाद दोनों को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन दोनों को बाजार की होड़, राजनीतिक बहुलवाद, जनकल्याण और आर्थिक स्थिरता के सही साधन के रूप में देखा जा रहा है। भारत में एक पूंजीवादी बाजार है। यहां ग्राहक और कंपनियां एक-दूसरे के साथ एक मुक्त बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, ताकि ग्राहकों को वस्तुओं के लिए सर्वोत्तम सेवाएं और सर्वोत्तम मूल्य मिल सके। हालांकि हमारे देश के पूंजीवाद में समाजवाद की कुछ विशेषताएं भी हैं, जहां सरकार स्वास्थ्य सेवाओं और बीमा के लिए कार्यक्रम चलाती है। भारत को पूंजीवाद और समाजवाद दोनों के अच्छे सिद्धांतों के मिश्रण वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था माना जा सकता है।

पूंजीवाद बनाम समाजवाद

पूंजीवाद और समाजवाद एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं। इनमें प्रमुख अंतर निम्न हैं –

  • पूंजीवाद और समाजवाद दुनिया के विभिन्न देशों द्वारा अपनाई गईं दो प्रमुख आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाएं हैं। समाजवाद और पूंजीवाद के बीच मुख्य अंतर बाजार में सरकारी हस्तक्षेप की सीमा का है। पूंजीवाद में बाजार को सरकार द्वारा सक्रिय रूप से नियंत्रित नहीं किया जाता, जबकि समाजवाद में सरकार का बाजार पर पूर्ण नियंत्रण होता है।
  • पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में संपत्ति और व्यवसाय निजी स्वामित्व में होता है, जबकि समाजवाद एक ऐसी अर्थव्यवस्था होती है, जिसमें उत्पादन के साधन राज्य या जनता के पास अधिक समतावादी तरीके से होते हैं।
  • पूंजीवाद में मुख्य रूप से लाभ कमाने पर ध्यान दिया जाता है। इसमें जनता और लोगों की समानता पर कम ध्यान केंद्रित होता है, जबकि समाजवाद संसाधनों के समान वितरण और जन कल्याण पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए नए उत्पादों के नवाचार पर जोर दिया जाता है, जबकि समाजवादी अर्थव्यवस्था में यह देखा जाता है कि सभी के पास समान और पर्याप्त उत्पाद हैं कि नहीं।

पूंजीवाद की विशेषताएं

हमें अक्सर पूंजीवाद के बारे में आलोचना सुनने को मिलती है, लेकिन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताएं और फायदे भी हैं, जैसे –

निजी संपत्ति पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में आप अपनी संपत्ति के मालिक होते हैं। इसमें उपकरण, भूमि, मशीनों और कारखानों जैसे निर्माण के सभी संसाधनों का स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पास हो सकता है।

मूल्य निर्धारण – पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में कंपनियां और उद्योग बाजार की मांग और आपूर्ति के आधार पर उत्पादों की कीमतें निर्धारित करते हैं। मूल्य निर्धारण किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप जैसे सरकारी और अन्य बाहरी कारकों से मुक्त होता है।

उद्योगों की स्वतंत्रता – आप अपनी पसंद के उद्योंग का चयन कर बाजार में उतर सकते हैं और अन्य उद्योगों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। इसमें आप बिना किसी प्रतिबंध के अपने लाभ और आय का प्रबंधन कर सकते हैं।

ग्राहक की संप्रभुता – पूंजीवादी बाजार में ग्राहकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पूंजीवादी बाजार में ग्राहकों की मांग और इच्छाओं के आधार पर उत्पादों का मूल्य निर्धारण किया जाता है। इसके अलावा प्रतिस्पर्धा के चलते ग्राहक को कम से कम मूल्य पर सर्वोत्तम उत्पाद और सेवाएं मिल सकती हैं।

लाभ का उद्देश्य – पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योगों का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है। इस कारण उद्योग सर्वोत्तम वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं और इसका सीधा लाभ ग्राहकों को होता है।

स्वतंत्रता – पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ग्राहक अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी सामान किसी भी कंपनी से खरीद सकते हैं तथा कारोबारी कोई भी कारोबार बिना किसी हस्तक्षेप के कर सकता है।

पूंजीवाद के लाभ

प्रतिस्पर्धा – पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में विभिन्न उद्योग अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए अधिक ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। इससे उद्योगों के बीच प्रतिस्पर्धा का जन्म होता है, जिससे ग्राहकों को कम कीमत पर अच्छी सुविधा मिलती है।

नवाचार – पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में उद्यम उत्पादों में ग्राहकों की रूचि बनाए रखने और कम कीमत पर अच्छा उत्पाद उपलब्ध कराने के लिए हमेशा नवाचार करते रहते हैं। इससे व्यवसायों में रचनात्मकता और दक्षता आती है और ग्राहकों का लाभ होता है।

पूंजीवाद के नुकसान

एकाधिकार – इस व्यवस्था मेंकभी-कभी कुछ वस्तुओं पर एक ही व्यक्ति का स्वामित्व हो जाता है। कोई और प्रतिद्वंद्वी न होने के कारण कई बार कंपनियां ग्राहकों का शोषण कर सकती हैं।

रोज़गार की समस्या – पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार होने से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए पढ़े-लिखे और दक्ष लोगों को रोज़गार उपलब्ध होता है। विकलांग, बुजुर्ग और कौशल विहीन लोग हाशिए पर ढकेल दिए जाते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here