ट्रांसफर प्राइसिंग का महत्व

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transfer pricing

ट्रांसफर प्राइसिंग का महत्व

एक ही या समान स्वामित्व या नियंत्रण वाली कंपनियों के बीच वस्तुओं और सेवाओं को बेचने की प्रक्रिया को ट्रांसफर प्राइसिंग (हस्तांतरण मूल्य निर्धारण) कहा जाता है। यह प्रक्रिया किसी कंपनी के उप-प्रभागों के बीच, किसी कंपनी की सहायक कंपनियों के बीच या उन कंपनियों के बीच हो सकती है, जिनके पास सभी का प्रबंधन होता है। इस प्रक्रिया में अक्सर कर लाभ मिलता है।

ट्रांसफर प्राइसिंग की जरूरत क्यों?

  • राजस्व सभी संबंधित कंपनियों के उत्पादों और सेवाओं का मूल्य एक समान रखने से कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ता।
  • पसंदीदा ग्राहक – यदि कोई संबंधित कंपनी किसी अन्य संबंधित कंपनी को कम कीमत में ऑर्डर देती है, तो ऑर्डर लेने वाली कंपनी अधिक लाभ कमाने के लिए बाहरी ग्राहकों को उत्पाद बेच सकती है।
  • पसंदीदा आपूर्तिकर्ता – यदि बिक्री करने वाली कंपनी द्वारा कीमतों में वृद्धि की जाती है, तो खरीदने वाली कंपनी कम कीमत की पेशकश करने वाली बाहरी कंपनी से सामान खरीद सकती है।

यह सब मूल कंपनी के मुनाफे को प्रभावित करते हैं।

ट्रांसफर प्राइसिंग के प्रकार

ट्रांसफर प्राइसिंग के 5 तरीके हैं। इनमें से तीन पारंपरिक लेनदेन विधियों और दो ट्रांजेक्शनल लाभ विधि अंतर्गत आते हैं, जो हैं –

पारंपरिक लेनदेन विधियां

  • तुलनीय अनियंत्रित मूल्य विधि (Comparable uncontrolled price method) – दो संबंधित कंपनियों के बीच के लेनदेन को नियंत्रित लेनदेन कहा जाता है। इस विधि में नियंत्रित लेनदेन की कीमत, नियमों और शर्तों की तुलना किसी तीसरे पक्ष के लेनदेन के साथ की जाती है। यह दो स्वतंत्र तृतीय पक्ष या करदाता कंपनी और एक स्वतंत्र कंपनी के बीच हो सकता है।
  • पुनर्विक्रय मूल्य विधि (The resale price method) – जिस कीमत पर एक संबद्ध उद्यम किसी उत्पाद को तीसरे पक्ष को बेचता है, उसे पुनर्विक्रय मूल्य कहा जाता है। इस विधि में पुनर्विक्रय मूल्य को नियंत्रित लेनदेन के लिए आधार माना जाता है। फिर पुनर्विक्रय मूल्य के मार्जिन की गणना अनियंत्रित लेनदेन के आधार पर की जाती है और इस मार्जिन को पुनर्विक्रय मूल्य से घटाया जाता है। इसके बाद कस्टम ड्यूटी जैसे अतिरिक्त खर्च घटाए जाते हैं। इसके बाद बची शेष राशि नियंत्रित लेनदेन के लिए ट्रांसफर प्राइस होती है।
  • लागत अधिक विधि (Cost plus method) – इस विधि में बिक्री की लागतों की तुलना सकल लाभ से की जाती है। इसमें सबसे पहले नियंत्रित लेनदेन में बिक्री की लागत पर फैसला करना होता है। इसके बाद लागत को कवर करने और मुनाफे को जोड़ने के लिए एक मार्क अप जोड़ा जाता है और अंतिम परिणाम ट्रांसफर प्राइस होता है।

ट्रांजेक्शनल लाभ विधियां

  • ट्रांजेक्शनल नेट मार्जिन विधि (Transactional net margin method) – इस विधि में नियंत्रित लेनदेन के शुद्ध लाभ की तुलना अनियंत्रित लेनदेन से की जाती है। इस तुलना के आधार पर कीमतें तय की जाती हैं।
  • लाभ विभाजन विधि (The profit split method) – कभी-कभी किसी कंपनी के भीतर किए गए लेनदेन का संबंध होता है। इस स्थिति में मुनाफे को विभाजित करने का निर्णय लिया जाता है। यह मुनाफा कैसे कमाया गया है, इस आधार पर इसका विभाजन होता है।

एडवांस प्राइसिंग एग्रीमेंट

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि ट्रांसफर प्राइसिंग (हस्तांतरण मूल्य निर्धारण) करने के लिए विभिन्न प्रकार के तरीके हैं। इसी प्रकार एडवांस प्राइसिंग एग्रीमेंट (अग्रिम मूल्य समझौता – एपीए) करदाता और कर प्राधिकरण के बीच एक समझौता होता है, जिसके अनुसार भविष्य के लेनदेन के लिए ट्रांसफर प्राइसिंग करने के लिए किस विधि का उपयोग किया जाएगा, यह तय किया जाता है। अग्रिम मूल्य समझौते निम्न प्रकार के हो सकते हैं –

  • स्वतंत्र एपीए – यह करदाता और करदाता के ही देश में स्थिति कर प्राधिकरण के बीच एक समझौता होता है।
  • द्विपक्षीय या दो-पक्षीय एपीए – इस समझौते में करदाता, करदाता का विदेश में संबद्ध समूह और दोनों देशों के कर प्राधिकरण शामिल होते हैं।
  • बहुपक्षीय एपीए – यह करदाता, कई देशों में करदाता के सहयोगी समूहों और सभी देशों के कर प्राधिकरणों के बीच समझौता होता है।

भारत में ट्रांसफर प्राइसिंग

भारत में कर लाभ लेने के उद्देश्य से 2001 में ट्रांसफर प्राइसिंग की अवधारणा शुरू की गई थी। 1961 के आयकर अधिनियम के अनुसार किसी भी नियंत्रित लेनदेन (संबद्ध उद्यमों) से हुई आय एक अनियंत्रित लेनदेन के रूप में मानी जाती है। क्योंकि उद्यम आपस में जुड़े हुए होते हैं, इसलिए असंबंधित उद्यमों के मामले में ही कर कानून लागू होते हैं। यह अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू दोनों तरह के लेनदेन पर लागू है। ट्रांसफर प्राइसिंग की अवधारणा एमएनसी के लिए महत्वपूर्ण होती है। इससे पहले एमएनसी कंपनियां दो अलग-अलग मूल्य निर्धारण करती थी। एक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए और दूसरा कराधान के लिए। लेकिन, ट्रांसफर प्राइसिंग को बढ़ावा देने वाले आयकर अधिनियमों के कारण अब कर लाभ लिया जा सकता है।

ट्रांसफर प्राइसिंग के उद्देश्य

  • मौद्रिक लेनदेन पर कर का बोझ कम किया जा सकता है।
  • विभिन्न कर नीतियों वाले देशों के बीच संतुलन बनाए रखना और प्रबंधित करना आसान होता है।
  • समग्र रूप से व्यवसाय के लाभ का अनुकूलन।
  • विदेशी निवेश के लिए प्रभावी निर्णय लिए जा सकते हैं।
  • पेनाल्टी लगाने के लिए नीतियों को विकसित किया जा सकता है।

ट्रांसफर प्राइसिंग में आने वाली समस्याएं

  • बहुराष्ट्रीय सेट अप में ट्रांसफर प्राइसिंग की प्रक्रिया जटिल हो सकती है। इसके लिए उचित कम्प्यूटेशन और योजना की आवश्यकता होगी।
  • ट्रांसफर प्राइसिंग को लेकर प्रबंधकों के बीच असहमति हो सकती है।
  • सेवा उद्योग में ट्रांसफर प्राइसिंग करना कठिन होता है।

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