डेट-इक्विटी अनुपात का विश्लेषण

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Debt to Equity Ratio

डेट-इक्विटी अनुपात का विश्लेषण

किसी व्यवसाय का डेट-इक्विटी अनुपात व्यापार में लेनदारों, शेयरधारकों और मालिकों द्वारा निवेश की गई पूंजी के योगदान को दर्शाता है। यह एक वित्तीय उपकरण है, जिसका उपयोग यह अनुमान लगाने के लिए किया जाता है कि शेयरधारक के योगदान का उपयोग करके कितनी राशि उधार ली जा सकती है। डेट-इक्विटी अनुपात को पूंजी संरचना अनुपात के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसका उपयोग शीट डेटा का उपयोग करके लंबी अवधि के लिए व्यापार की वित्तीय स्थिरता का मूल्यांकन करने के लिए किया जाता है। कंपनी की स्थिति का आकलन करते समय डेट-इक्विटी अनुपात को ऋणदाताओं, निवेशकों, प्रबंधन और सरकार जैसे विभिन्न वर्गों द्वारा अलग-अलग रूप में देखा जाता है। अलग-अलग लोगों के अनुसार वित्तीय अनुपात की व्याख्या भिन्न हो सकती है।

उदाहरण के लिए निवेशक और लेनदार इस डेटा का उपयोग निवेश के प्रभावी निर्णय लेने के लिए करते हैं। यदि कंपनी के पास अपने अल्पकालिक और दीर्घकालिक दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पूंजी होती है, तो व्यवसाय को सॉलवेंट (विलायक) माना जाता है। इस प्रकार इस डेटा का उपयोग लेनदारों और निवेशकों द्वारा किसी कंपनी या व्यवसाय की दीर्घकालिक सॉल्वेंसी को समझने के लिए किया जाता है। डेट-इक्विटी अनुपात बहुत मायने रखता है। इसलिए इस लेख के माध्यम से इसी के बारे में जानकारी दी जा रही है।

डेट-इक्विटी अनुपात क्यों महत्वपूर्ण है?

डेट–इक्विटी अनुपात एक सामान्य समीकरण होता है, जो पैसों के संग्रह के बारे में डेटा प्रदान करता है और यब बताता है कि व्यापार को चलाने के लिए फंड कैसे जुटाया गया है। इसे किसी व्यवसाय के वित्तीय स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कंपनी की स्थिरता और विकास तथा विस्तार के लिए अतिरिक्त पूंजी जुटाने की क्षमता को समझने के लिए किया जाता है।

यदि आप किसी कंपनी के मालिक हैं, तो इस अनुपात का उपयोग तब किया जाएगा, जब आप ऋण या बिजनेस लाइन ऑफ क्रेडिट का लाभ लेना चाहते हों। निवेशक किसी कंपनी के डेट-इक्विटी अनुपात को एक महत्वपूर्ण वित्तीय संकेतक के रूप में देखते हैं, क्योंकि यह उन्हें किसी विशेष कंपनी में निवेश करने में शामिल जोखिमों को समझने में मदद करता है। किसी कंपनी का डेट-इक्विटी अनुपात जितना अधिक होता है, उसमें निवेश करना उतना ही जोखिम भरा होता है।

कितना डेट-इक्विटी अनुपात अच्छा माना जाता है?

जब डेट-इक्विटी अनुपात 1 से 1.5 के आसपास होता है, तो यह अच्छा माना जाता है। लेकिन अनुपात हर उद्योग के लिए स्थिर नहीं होता। यह उद्योग पर निर्भर करता है और बदलता रहता है, क्योंकि कुछ उद्योग अन्य उद्योगों के वित्तपोषण की तुलना में ऋण का उपयोग अधिक करते हैं। वित्तीय और विनिर्माण जैसे कुछ उद्योग, जिनमें अक्सर अधिक पूंजी की जरूरत होती है, का डेट-इक्विटी अनुपात आमतौर पर अधिक होता है। इनमें यह 2 से अधिक हो सकता है। जब कंपनी का डेट-इक्विटी अनुपात अधिक होता है, तो इसका मतलब होता है कि कंपनी अपने व्यापार की वृद्धि और वित्तपोषण के लिए मुख्य रूप से ऋण का उपयोग करती है। इसके अलावा जो कंपनियां परिसंपत्तियों और संचालन में अधिक निवेश करती हैं, उनका डेट-इक्विटी अनुपात भी अधिक होता है। अक्सर निवेशकों और ऋणदाताओं द्वारा इसे अलग-अलग रूप में देखा जाता है। ऋणदाता के लिए डेट-इक्विटी अनुपात अधिक होने का का मतलब है कि व्यवसाय ऋण के माध्यम से ही चल रहा है और भविष्य में अपने ऋणों को चुकाने में सक्षम नहीं रहेगा। यदि किसी कंपनी का डेट-इक्विटी अनुपात कम होता है, तो इसका मतलब है कि कंपनी के पास पर्याप्त पैसा है और यह उधार लेकर अपना परिचालन करने में विश्वास नहीं करती है। इसके विपरीत निवेशकों द्वारा ऐसे उद्यमों में निवेश करने की संभावना अधिक होती है, जिनका डेट-इक्विटी अनुपात अधिक होता है। निवेशक अक्सर कम डेट-इक्विटी अनुपात वाले उद्यमों में निवेश करने से बचते हैं, क्योंकि ऐसी कंपनी को सार्वजनिक ऋणदाताओं के माध्यम से अपनी पूरी क्षमता का एहसास नहीं होता है।

डेट-इक्विटी अनुपात का सूत्र

हमें डेट-इक्विटी अनुपात के बारे में पहले से ही पता है आइए अब इसके सूत्र को समझने की कोशिश करते हैं –

डेट-इक्विटी अनुपात = कुल देनदारियां / शेयरधारक की इक्विटी

सूत्र में दो तत्व शामिल हैं, जो हैं –

कुल देनदारियां – यह कंपनी द्वारा लिए गए कुल ऋण को दर्शाती हैं। इनमें अल्पकालिक और दीर्घकालिक ऋण और अन्य देनदारियां जैसे कर देनदारियों आदि शामिल होती हैं।

शेयरधारक की इक्विटी – कुल देनदारियों में से कंपनी की परिसंपत्तियों को घटाने पर प्राप्त परिणाम शेयरधारक की इक्विटी को दर्शाता है।

डेट-इक्विटी अनुपात अधिक होने पर लाभ

अधिक डेट-इक्विटी अनुपात कभी-कभी अच्छा हो सकता है, क्योंकि यह इंगित करता है कि व्यवसाय अपने नकदी प्रवाह के माध्यम से अपने ऋण दायित्वों को आसानी से पूरा कर सकता है और रिटर्न बढ़ाने के लिए ऋण का उपयोग कर रहा है।

डेट-इक्विटी अनुपात अधिक होने पर नुकसान

ऐसे मामलों में जब कंपनी का डेट-इक्विटी अनुपात बहुत अधिक होता है, कंपनी की देनदारियां अधिक होती जाती हैं और कंपनी अपने ऋणों को चुकाने की क्षमता खो सकती है। ऐसे मामलों में कंपनी की WAAC के रूप में उधार लेने की लागत बहुत अधिक हो जाती है और इक्विटी की लागत भी अधिक हो जाती है तथा इस प्रकार कंपनी के शेयरों की कीमत कम हो जाती है।

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